गढ़कालिका मंदिर

पुराणों के अनुसार जिस समय राम, रावण को मारकर अयोध्या वापस लौट रहे थे तो वे कुछ देर के लिए रुद्रसागर के पास रुके थे। उसी रात को कालिका भक्ष्य के रूप में निकली हुई थीं। उन्होंने हनुमान को पकड़ने का प्रयत्न भी किया पर हनुमान के भीषण रूप लेने पर देवी भयभीत हो गई। भागने के समय जो अंग गलित होकर गिर गया, वही स्थान यह कालिका देवी का है।

मंदिर के अंदर ही गणेशजी की प्राचीन पौराणिक प्रतिमा है, सामने ही पुरातन हनुमान मंदिर है। इससे लगी हुई विष्णु की एक भव्य चतुर्भुज प्रतिमा है जो अद्भुत और दर्शनीय है।क्षिप्रातट पर प्राचीन सिद्ध शमशान है। नाथ परंपरा की भर्तृहरि गुफा और मत्स्येन्द्र नाथ की समाधि भी इसी क्षेत्र में है।

महाकवि कालिदास के बारे में कौन नहीं जानता। महाकवि कालिदास उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्नों में से एक थे। बुद्धि कौशल तथा कविता रचना में उनकी प्रतिभा विलक्षण थी। कहते हैं बाल्यकाल में कालिदास एक सामान्य बालक की तरह ही थे। कालिदास अपनी आराध्य देवी की कृपा से ही महाकवि बने और सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्नों में शामिल हुए। कालिदास की आराध्य देवी गढ़कालिका का मंदिर आज भी उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थापित है। इनकी आराधना से ही कालिदास सरस्वती पुत्र कहलाए। आज भी यहां विद्या प्राप्ति के इच्छुक सैकड़ों विद्यार्थी आराधना करने आते हैं। कहते हैं जो भी विद्यार्थी सच्चे मन से यहां प्रार्थना करता है मां उसका कल्याण अवश्य करती है।

मंदिर परिसर में अतिप्राचीन दीप स्तंभ भी हैं जो कि नवरात्रि के दौरान रोशन होते हैं। इनमें 108 दीप विद्यमान हैं। जो कि शक्ति का प्रतीक हैं। नौंवी सदी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हर्ष विक्रमादित्य ने करवाया था।

माता को श्रृंगार समग्री चढ़ाई जाती है। माता का स्वरूप काफी प्रसन्नतादायक है। भक्तों पर कृपा करते हुए माँ सदा मुस्कृराती हुई प्रतीत होती हैं। मूर्ति में चांदी के दांतों का भी आकर्षक प्रयोग किया गया है। माता की मूर्ति सिंदूरवर्णी है। जिसका प्रातः से ही स्नान, अभिषेक व श्रृंगार पंडितों द्वारा किया जाता है।

 
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