विक्रांतमहाभैरव मंदिर

प्राचीन श्री विक्रांत महाभैरव मंदिर। जनश्रुति है कि यह मंदिर तीन-चार सहस्राब्दियों पूर्व एक विशाल भैरव मंदिर था। इसकी प्राचीनता स्वत: सिद्ध है। प्राचीन मन्दिर के भग्रावशेष, कंगूरेदार शिखर, टूटे हुए स्तम्भ व पाषाण पर नक्काशीदार खंडित मूत्तियाँ शिप्रा से प्राप्त हुई हैं जो इसके प्रमाण हैं।

कहते हैं यह अतीत में तंत्र साधकों की तपस्थली रहा है। मन्दिर के आसपास विद्यमान अति प्राचीन मूत्तियां स्वयं अपनी कहानी कहती हैं। स्कन्दपुराण में उल्लेख है कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान् शिव से अवन्ती क्षेत्र के प्रमुख देवताओं व तीर्थों का वर्णन करने का निवेदन किया। सनत्कुमारजी के अनुसार तब महादेवजी ने कहा कि यहां शिप्रा सहित मेरी चार प्रिय नदियां हैं। यहाँ चौरासी लिंगों के रूप में उतने ही शिव निवास करते हैं, आठ भैरव रहते हैं, ग्यारह रुद्र, बाहर आदित्य और छ: गणेश हैं तथा चौबीस देवियां हैं।

महादेवजी ने जिन आठ भैरवों के नाम बताएं वे हैं— 1. दण्डपाणि, 2 विक्रांत 3. महाभैरव 4. बटुक 5. बालक 6. बन्दी 7. षट्पंचाशतक व 8. अपर कालभैरव।

विक्रांत का अर्थ है जिनकी अंगकांति तपाये हुए स्वर्ण के समान है और नाम के अनुरूप ही तेजस्विता और आलोक विक्रान्त भैरवजी की सिन्दूरचर्चित मूर्ति पर दर्शनीय है। यह स्थल नीरव, एकांत व प्रकृति की मनोहारी नैसर्गिक छटा से युक्त है। यहां दक्षिणवर्ती भैरव की चैतन्य मूर्ति है, जाग्रत श्मशान भूमि है। शिप्रा पूर्ववाहिनी है, प्राचीन शिव मन्दिर है, सती माता के पूज्य चरण हैं, कृत्याओं और मातृकाओं की खंडित पाषाण प्रतिमाएं हैं। ऊँचे घने वृक्ष हैं और सूर्यास्त के उपरांत अंधकार की चादर से ढंका विस्मयकारी वातावरण।

ओखरेश्वर शमशान भूमि से चमत्कारों की अनेक गाथाएं जुड़ी हुई हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार इस भैरवतीर्थ में एक उत्तम स्वभाववाली काली नामक योगिनी रहा करती थी जिसने भैरवजी को अपने पुत्र की भांति पाला था। वे भैरवजी शिप्रा नदी के उत्तरी तट पर सदा स्थित रहते हैं। इसी पुराण में आगे लिखा है— सुंदर चंद्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने मस्तक पर मुकुट और गले में मोतियों की माला धारण कर रखी है तथा जो मनुष्य मात्र के लिए कल्याणस्वरूप हैं, उन विशालकाय भगवान् भूतनाथ भैरव का है मन, तू भजन कर— भज जन शिवरूपम् भैरवं भूतनाथम्।

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